Poem

अम़न खा़तिर…


Exasperation of a “Silenced Critique”…

“ताकि कमान से ना छूटे, उसका अहंकार,
अम़न-ए-वतन खा़तिर, त्याग दिये,
सर्वस्व अधिकार मैंने !

ताकि बना रहे उसका, कद कद्र बरकरार,
अम़न-ए-रिवायतों खा़तिर, परदा किये,
सर्वत्र सरोकार मैंने !

ताकि अन्ततः ज्वलंत रहे, उसकी ज़हरीली हुंकार,
अम़न-ए-जिरह़ ख़ातिर, मौन किये,
समझ, शिष्टाचार मैंने !

ताकि “झमूरीयत” कारोबार के वशीभूत रहे, उसकी जमहूरियत सरकार,
अम़न-ए-विषमता ख़ातिर, बिसरा दिये,
दरिद्रता के हाहाकार मैंने !”

ताकि कालचक्र स्वतः विध्वंस करे, उसकी खोखली दीवार,
अम़न-ए-रूह़ ख़ातिर, समर्पित किये,
ढाल, हथियार मैंने !

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बदलाव की आंधी !


आजकल बदलाव की आंधी है,
फै़ली अधीरता की माहामारी है !
सुना है कि अब लोग,
कपड़ों की तरह, किरदार बदल देते हैं!

आवा़म में बेमियादी बेसब्री का आलम है,
कि पाँच सालों में ही बोर होके,
हम अच्छी-बुरी सरकार बदल देते हैं!

ख़ूब सुहावने दिखते हैं, परदेस के ढोल,
कि अब तो उपलब्धि मान के,
देशभक्त भी, अपनी पहचान बदल देते हैं !

ऊँच-नीच के फ़ेर में पड़के,
बेमेल रुतबे के ख़ातिर,
हम सच्चे दोस्त, प्यार, परिवार बदल देते हैं!

इसी बदलाव की भीड़ में कुचल के,
कौड़ियों के दाम पर,
सुना है अब तो लोग, भगवान भी बदल देते हैं!

बस खु़दा की रहमत है,
जो नवाज़िश नहीं, हमें ये वरदान!
शुक्र है, जो नहीं मिला,
हमें मात्-पिता बदलने का अधिकार!

वरना तो…
आजकल बदलाव की आंधी है,
फै़ली अधीरता की माहामारी है !
सुना है कि अब लोग,
कपड़ों की तरह, किरदार बदल देते हैं!

Indian Elections : An Eulogy !!!


“गूँगे” ने मचाया इतना शोर,
कि दुनिया अब,
“बड़बोले” को चुनने चली !

“ढैंचू ढैंचू” से हुई इतनी बोर,
कि दुनिया अब,
“मैं मैं” को चुनने चली !

“ठाकुर” तो निकला बेबस़ और कमज़ोर,
कि दुनिया अब,
“गब्बर” को चुनने चली !

“Secularism का बुर्खा़” पहनने वाले तो निकले चोर,
कि दुनिया अब,
“मौत के सौदागर” को चुनने चली !

“ठीक है” से नहीं चलेगा, India मांगे More,
कि दुनिया अब,
“Act” नहीं “Action” को चुनने चली !

एै “धृतराष्ट”, तू अब तो गद्दी छोड़,
कि दुनिया अब,
“औरंगजे़ब” को चुनने चली !