हमनें सुना है…


कि अब तो बैठक, सजी रहती होगी आजकल,
सुना है, उनके घर में मेहमानों का, अकाल पड़ा है ।

सब खुश हैं, ठंडे चौपहियोंं में बैठे अकेले,
सुना है, उन बंजारों के झुंड से, ट्रैफिक बड़ा है ।

बाकी सब लाडलों के, विदेशों में बसें हैं घर,
सुना है, बस वो पाँव दबाता लड़का, निकम्मा बड़ा है ।

देश धर्म वण वर्ग जात पात में, बटे हैं सब,
सुना है, उनके रहनुमाओं की क्यारियों में, मुर्दा गढ़ा है ।

गुरु-भक्त एकलव्य, कटा बैठा अंगूठा अपना,
सुना है, ज़ुबान कटा के देशभक्त बनने का, चलन बड़ा है ।

ज़हीन और ज़मीर, तो पहले ही ख़ो चुके थे लिख़ने वाले,
सुना है, तहज़ीब भी जाता देख, ग़ालिब हँस पड़ा है ।

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