कश्मीरी कश्मक़श …


जिसकी जन्नत का, ज़र्रा ज़र्रा डोला हो,
उसका क्यों न, ख़ून ख़ौलता हो !
जब मरा हो कोई अपना, बेवजह यूं ही,
आक्रोश में फिर भी, सिर्फ पत्थर ही उठता हो ?

माना की ओढ़ी थी, नपुंसकता की चादर मैंने,
जब कोई भयाकुल भाई की, चीखें भूलता हो !
हाँ निकला था मेरा गुल्शन-ए-फ़िरदौस , इंक़लाबी होने, पर
उसे जिहादी बनता देख, अब वो सुनेहरा चिनार भी रोता हो !

पर न शहीदियों का मलाल होगा, न जेहादियों का महिमामंडन,
जब कोई कश्मीर की नहीं, कश्मीरी की हक़ की बोलता हो !
पर जंग की ख़ेती, कब समझे है, ये बन्दूक-धारी,
वर्ना एक गोली से क्यों, मिटटी में सौ बवाली बोता हो ?

रोज़ डूबाया जा रहा हूं गहरा, सियासी दलदलों में,
कि देख, इस बाग़ी का बाक़ी, अब बस एक हाथ ढूंढता हो !
की उस ज़िंदा लाश में, फूँक दो थोड़ा अपनापन, ए हमदर्द ,
जिसे हर रात दस्तरख़ान पे, पूरा देश कोसता हो !

ए हिन्द, बचा लो, लगा लो गले, और पूछ लो प्यार से ,
क्या पता, कि कश्मीर, सिर्फ़ तेरा साथ ढूंढता हो ?

 

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